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सती रानी की कहानी

अपनी परंपराओं के पीछे छिपे इतिहास और अपनी जड़ों को जानने की एक पहल

हमारे कुलश्रेष्ठ समाज में पीढ़ियों से एक मान्यता चली आ रही है – “सती रानी की आन”। इसी मान्यता से जुड़ी एक परंपरा है कि कुलश्रेष्ठ परिवारों में मंगोड़ी नहीं सुखाई जाती और न ही घर के शुभ कार्यों के अवसर पर इसे बनाया या रखा जाता है।

इस परंपरा के पीछे ररुआ की एक रानी की दुखद कहानी जुड़ी है। मान्यता है कि उनके प्रति सम्मान और उनके परिवार के दुख में सहभागी होने के भाव से यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाई जाती रही है।

अक्सर हम अपने परिवारों में चली आ रही ऐसी परंपराओं का पालन तो करते हैं, लेकिन उनके पीछे छिपी कहानियों और इतिहास को जानने का प्रयास नहीं करते। आइए, आज अपने पूर्वजों से जुड़ी ऐसी ही एक कहानी को जानें, जो हमें हमारे इतिहास और हमारी जड़ों से जोड़ती है।

चंदावर में मिला इतिहास का एक भूला हुआ अध्याय

कुछ वर्ष पूर्व फिरोजाबाद में यमुना नदी के किनारे, चंदावर गाँव के पास सड़क निर्माण के लिए जंगल की सफाई का कार्य चल रहा था। इसी दौरान एक प्राचीन मंदिर परिसर और कुछ सती मंदिरों के अवशेष मिले। यहाँ मिले एक शिलालेख से पता चला कि इस स्थान का संबंध मैनपुरी जिले की ररुआ रियासत के राजा अमर सिंह जी और उनकी रानी से था।

ररुआ गाँव मैनपुरी जिले में स्थित है और कुलश्रेष्ठ समाज के प्रमुख ऐतिहासिक खेड़ों में से एक माना जाता है। यहाँ का राजवंश भी कुलश्रेष्ठ कायस्थ था। आज भी गाँव में एक टीले पर उनके पुराने राजमहल के अवशेष देखे जा सकते हैं।

इस मंदिर परिसर की खोज ने हमारे पूर्वजों से जुड़ी एक ऐसी कहानी की ओर ध्यान आकर्षित किया, जो समय के साथ धीरे-धीरे विस्मृति में जा रही थी।

चंदावर का युद्ध और राजा अमर सिंह

यह बात सन 1194 ईस्वी की है। पृथ्वीराज चौहान को पराजित करने के बाद मुहम्मद गौरी ने उत्तर भारत पर अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए एक और बड़ा आक्रमण किया। इस बार उसका सामना कन्नौज के राजा जयचंद से हुआ। दोनों सेनाओं के बीच चंदावर के मैदान में भीषण युद्ध हुआ, जिसे चंदावर के युद्ध के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध में ररुआ के राजा अमर सिंह जी भी राजा जयचंद की सेना की ओर से शामिल थे।

इस युद्ध की एक रोचक कथा यहाँ के एक सूफी संत और उनकी दरगाह से भी जुड़ी है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस संत को यहाँ ‘सौंपी महाराज’ के नाम से पूजा जाता है। कहा जाता है कि वे युद्ध के समय चंदावर में ही मौजूद थे।

कथा के अनुसार, युद्ध शुरू होने से पहले प्रतिदिन सुबह राजा जयचंद और राजा अमर सिंह जी इस संत के पास एक लोटा जल लेकर जाते और उनसे विजय का आशीर्वाद प्राप्त कर युद्धभूमि में लौटते थे।

युद्ध कई दिनों तक चला और कन्नौज की सेना मुहम्मद गौरी की सेना को कड़ी टक्कर दे रही थी। अफगान सेना का नेतृत्व कुतुब-उद-दीन कर रहा था। अपनी सेना की स्थिति देखकर वह चिंतित हो उठा। तभी उसके गुप्तचरों ने उसे उस सूफी संत और उनके आशीर्वाद से जुड़ी इस परंपरा के बारे में बताया।

कहानी के अनुसार, अगले दिन कुतुब-उद-दीन स्वयं राजाओं से पहले संत के पास पहुँच गया और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर लिया। उस दिन राजा जयचंद और राजा अमर सिंह जी को संत का आशीर्वाद नहीं मिल सका। माना जाता है कि इसका असर सेना के मनोबल पर भी पड़ा।

इसी दुर्भाग्यपूर्ण दिन युद्ध का पलड़ा बदल गया। राजा जयचंद की आँख में तीर लगने से उनकी मृत्यु हो गई। कुछ ही समय बाद राजा अमर सिंह जी भी युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए।

स्थानीय लोककथा के अनुसार, राजा अमर सिंह जी की मृत्यु का समाचार सुनकर उनकी रानी ने भी सती होने का निर्णय लिया। इस दुखद घटना की स्मृति में युद्ध के बाद उस स्थान पर सती मंदिर का निर्माण कराया गया।

हो सकता है कि यही वह घटना हो, जिससे हमारे कुलश्रेष्ठ परिवारों में मंगोड़ी न सुखाने की परंपरा जुड़ी हुई है। यह केवल एक रीति-रिवाज नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक पारिवारिक स्मृति है, जिसे हमारे बुजुर्गों ने अपनी परंपराओं के माध्यम से आज तक संजोकर रखा है।

अपनी विरासत को संजोने का प्रयास

कासगंज का राजपरिवार भी ररुआ खेड़े से अपना संबंध रखता है। मंदिर परिसर की खोज के बाद इस इतिहास से जुड़े परिवारों और उनके वंशजों को खोजने का प्रयास किया गया, ताकि वे भी इस स्थान से जुड़ सकें और अपने पूर्वजों से संबंधित इन कथाओं को जान सकें।

चंदावर में स्थित इन प्राचीन मंदिरों और ऐतिहासिक स्थल की देखभाल के लिए एक ट्रस्ट का गठन किया गया है। यह ट्रस्ट पूरे क्षेत्र के संरक्षण का कार्य करता है और स्थानीय निकायों द्वारा संचालित अन्य उत्खनन स्थलों को भी सहयोग देता है। इस ट्रस्ट में कासगंज परिवार की सुनीति मान सिंह भी एक सदस्य हैं। इस मंदिर परिसर में एक दुर्गा मंदिर भी बनवाया गया है। पूरा परिसर उन ऐतिहासिक घटनाओं और स्थानीय आस्थाओं की स्मृतियों को संजोए हुए है।

अपने खेड़ों और अपनी जड़ों से जुड़ने की आवश्यकता

यहाँ एक बात विचार करने योग्य है। हम कुलश्रेष्ठ समाज के लोग अपने-अपने खेड़ों का उल्लेख अक्सर पूजा-पाठ, विवाह और अन्य पारिवारिक शुभ अवसरों पर करते हैं। हमारे गोत्र, कुल और खेड़े हमारी पहचान का अभिन्न अंग हैं। लेकिन क्या हम वास्तव में उन स्थानों को जानते हैं, जिनसे हमारा पारिवारिक इतिहास जुड़ा है? क्या कभी हमने अपने पूर्वजों के उन गाँवों में जाकर वहाँ की मिट्टी, पुराने मकानों, किलों, मंदिरों और ऐतिहासिक अवशेषों को देखने का प्रयास किया है? क्या हमने वहाँ रहने वाले उन परिवारों से मिलने की पहल की है, जिनसे कभी हमारे पूर्वजों के पारिवारिक और सामाजिक संबंध रहे होंगे?

चंदावर का दुर्गा मंदिर परिसर

हमारे खेड़े केवल पूजा-पाठ या विवाह के अवसर पर दोहराए जाने वाले नाम नहीं हैं, बल्कि वे हमारे पूर्वजों के जीवन, उनकी स्मृतियों और हमारी साझा विरासत के जीवंत साक्षी हैं। अपनी जड़ों को सही मायने में समझने के लिए केवल अपने खेड़े का नाम जानना पर्याप्त नहीं है। हमें उन गाँवों तक पहुँचना होगा, उनके इतिहास को जानना होगा, वहाँ बिखरे अपने अतीत के निशानों को सहेजना होगा और उन परिवारों से अपने संबंधों को फिर से जोड़ना होगा, जिनके साथ कभी हमारी साझा विरासत रही है।

ररुआ गाँव इसका एक उदाहरण है। मैनपुरी जिले में स्थित इस गाँव में आज भी एक टीले पर पुराने राजमहल के अवशेष मौजूद हैं। चंदावर में मिले मंदिरों की खोज ने हमें अपने इतिहास के एक भूले हुए अध्याय तक फिर से पहुँचने और अपने पूर्वजों से जुड़े परिवारों और स्थानों को पहचानने का अवसर दिया है।

आज आवश्यकता है कि हमारी नई पीढ़ी भी अपने पूर्वजों के गाँवों तक पहुँचे, उनके इतिहास को जाने, वहाँ के लोगों से जुड़े और इन कहानियों तथा ऐतिहासिक धरोहरों को अगली पीढ़ियों तक पहुँचाए।

क्योंकि अपनी जड़ों को जानना केवल अपने अतीत को याद करना नहीं है, बल्कि अपनी पहचान को समझना और अपनी विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजना भी है।

स्रोत